how to become intelligent , बुद्धिमान कैसे बनें

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how to become intelligent: मै बुद्धू नहीं हूँ

एक सज्जन को अमृतसर जाना था। वह निश्चित समय से बीस -पच्चीस मिनट पहले ही प्लेटफॉर्म पर आ पहुंचा।  उसने अपने सामान को एक बैंच के पास रखा और पास ही स्वयं खड़ा हो गया। तभी वहां तीन खूबसूरत जबान आय और उस सज्जन से बोले , आप को अमृतसर जाना हैं ? उस सज्जन ने हाँ  में सिर हिला दिया।  उस में से एक नौजबान बड़ी फुर्ती से बोला , हमें भी वही जाना हैं।

गाड़ी कुछ लेट चल रही हैं।  आइये-आइये,  यही बैंच पर बैठे । उस नौजबान की आवाज में कुछ ऐसी कशिश थी कि वह सज्जन इन्कार ना कर सका।  “आप ताश -बाश भी खेलना जानते हैं या नहीं ?” उस नौजबान ने उस सज्जन के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा।

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खूब जानता हूँ , उस सज्जन ने भी बेतखल्लुफ़ होते हुए कहा । तो हो जाय एक आध् गेम। बक्त भी कट जायगा। आप बैसे भी सफर पर आ रहे हैं , चार पैसे ही खरे कर लीजिये। इतना कहते हुए उस नौजबान ने झट से अपने दो साथीयो को भी बुला लिया।  उस सज्जन के अंदर का लालच फौरन जग उठा और उस ने हँसते -हँसते एक आध – गेम खेलने की हाँ कर दी। आदमी की यह बदकिस्मती हैं की उसे माया आती हुई तो दिखाई दी। जाती हुई नहीं।

खेर , देखते ही देखते ताश बाट दी गई और गेम शुरू हो गया। उस सज्जन को पहली ही गेम में काफी सफलता मिली। दूसरी गेम शुरू हो गई । दूसरी बाजी उसी ने जीती। उसके हाथ में पैसे बढ़ने लगे। समय बीते देर ना लगी। तभी दूर से आती गाड़ी की आवाज सुनाई पड़ी। अब गाड़ी प्लेटफॉर्म पर पहुंचने ही बाली थी। प्लेटफॉर्म पर गाड़ी के इंतजार में खड़े मुसाफिर अपना – अपना सामान सम्भालने लगे।

लेकिन आवाज सुनने के बाद भी ताश में मस्त वह सज्जन ना उठा। पास ही एक अन्य सज्जन खड़े थे। उन्होंने उससे कहा “गाड़ी की आवाज सुनाई दे रही हैं।“ गाड़ी बस पहुंचने ही बाली हैं उठ कर सामान सम्भालो ।” मै वहरा नहीं हू। मेने भी आवाज सुन ली हैं। “  -उस सज्जन ने ताश का पत्ता फेकते हुए कहा ।

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और गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आकर लग गई। लेकिन वह सज्जन जुहे में ऐसा मस्त था कि उसने सोचा, अभी तो गाड़ी लगी हैं।  अभी छूटने मै काफी टाइम है। तब तक एक दो बजी और खेल लू। पास खड़े उस सज्जन से फिर कहा “आप की गाड़ी आ चुकी हैं। सामान चढालो। भीड़ ज्यादा है बाद मै मुश्किल होगी |” माया के रंग मै रंगे उस सज्जन ने लापरबाही मै कहा “मै अन्धा नहीं हू। मेने भी देख लिया हैं कि गाड़ी आ चुकी  हैं। आप अपनी फ़िक्र कीजिये। मेरी चिंता की जरुरत नहीं।

दूसरे सज्जन सन्त स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने उसकी बात का अब भी बुरा नहीं मनाया। लगता था कि उसके परोपकार उसके स्वभाव का अंग था। कुछ देर के बाद गाड़ी चलने के लिए आवाज दे रही थी। उपकारवश उस दूसरे सज्जन ने एक बार फिर कहा ”गाड़ी छूटने बाली हैं। जल्दी सामान गाड़ी में रखो नहीं तो गाड़ी अगले स्टेशन के लिए रबाना हो जायेगी और तुम गाड़ी नहीं पकड़ पाओगे। उस आदमी को चालू बाजी जीतने की आशा लग रही थी।

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उसे उस सज्जन की बातो पर गुस्सा आ गया। वह गर्जती हुई आवाज में बोला, आप मेरे पीछे क्यों पड़ गए है? क्या मुझे आवाज सुनाई नहीं देरही हैं? मै सब समझता हू । मै कोई बुद्धू नहीं हू । तुम्हे गाड़ी पकड़नी हैं तो पकड़ो मेरी जान के पीछे क्यों पड़े हो? दूसरे सज्जन भाग कर अपने डिब्बे में जा पहुंचे।

करते -करते गाड़ी ने गति पकड़ ली वह सज्जन वहीँ ताश खेलता रह गया।

 यह स्थिति उस महानुभाव की ही नहीं, बल्कि आज के हर आदमी की है।  हर आदमी सुनता है, हर आदमी देखता है, हर आदमी समझता है, कि जीवन हाथो से जा रहा है परन्तु उस मुसाफिर की तरह माया के रंग में खोया मंजिल की तरफ कदम नहीं उठाता है। सुनना,  देखना या समझना उसी के जीवन सवारता है, जो सुनने, देखने और समझने के अनुसार अपने जीवन को ढाल लेता है।  

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